उत्तर प्रदेश शासन ने 08 जुलाई 2022 को एक शासनादेश जारी किया है। यह आदेश तय करता है कि हाईकोर्ट में राज्य सरकार के विरुद्ध चल रहे मुकदमों में विभाग कितने समय में जवाब देंगे और किसकी जिम्मेदारी होगी। जिन सरकारी कर्मचारियों ने अपने सेवा मामलों में रिट याचिका दायर की है और जो विभागीय अधिकारी मुकदमों का काम देखते हैं, दोनों के लिए यह आदेश महत्वपूर्ण है। आम नागरिकों के लिए भी यह जानना उपयोगी है कि सरकार की ओर से जवाब देने की प्रक्रिया क्या है।
एक नज़र में (Quick Summary)
बिंदु | जानकारी |
शासनादेश संख्या | 06/2022/423/सात-न्याय-अनु0प्रको0/2022-1/2008 |
दिनांक | 08 जुलाई 2022 |
जारीकर्ता | मुख्य सचिव, उ0प्र0 शासन (अनुश्रवण प्रकोष्ठ, न्याय विभाग) |
किसको भेजा गया | समस्त अपर मुख्य सचिव / प्रमुख सचिव / सचिव, उ0प्र0 शासन |
विषय | हाईकोर्ट में लंबित शासकीय वादों का त्वरित निस्तारण और समय पर प्रभावी पैरवी |
कुल निर्देश | 26 बिंदु + मॉनिटरिंग का प्रारूप (संलग्नक) |
मुख्य समय-सीमा | प्रतिशपथ पत्र (Counter Affidavit) अधिकतम 10 कार्य दिवस में |
लागू | तत्काल प्रभाव से |
यह आदेश क्यों जारी हुआ?
शासनादेश के अनुसार, सरकार ने मुकदमे कम करने के लिए राज्य मुकदमा नीति (State Litigation Policy) लागू की थी और समय-समय पर कई शासनादेश भी जारी किए थे। इसके बावजूद विभागों द्वारा लगातार पैरवी न होने के कारण हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सरकारी मामले बढ़ते जा रहे थे।
इसकी एक प्रमुख वजह इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक अवमानना वाद (Contempt Case) बना: अवमाननावाद संख्या 300/2022, राकेश देवी उर्फ राकेश कुमारी बनाम सतीश कुमार, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी। इसमें हाईकोर्ट ने अपने आदेश दिनांक 18.05.2022 में मौजूदा व्यवस्था पर अप्रसन्नता जताई और ये निर्देश दिए:
• राज्य सरकार से जुड़े वादों के लिए समग्र कार्य योजना (Comprehensive Plan) बनाई जाए।
• कोर्ट के आदेश की सूचना मिलते ही अपील करनी है या नहीं, इसका जल्दी निर्णय लेने के लिए एक तंत्र (Mechanism) बने।
• कोर्ट के निर्देश के 24 घंटे के भीतर राज्य विधि अधिकारी, विधि परामर्शी कार्यालय और विभाग के बीच ई-मेल से सूचना साझा हो।
• विधि परामर्शी ई-मेल से तीन दिन में राय देने का प्रयास करें।
इसके बाद 24-05-2022 और 04-06-2022 को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बैठकें हुईं और यह नया शासनादेश जारी किया गया।
पुराने शासनादेश अवक्रमित (Superseded)
इस आदेश ने पैरवी से जुड़े ये पुराने शासनादेश अवक्रमित कर दिए हैं, यानी अब इनकी जगह यही आदेश मान्य है:
• संख्या 1142/सात-न्याय-1-11-75/2010, दिनांक 24.03.2011
• संख्या 36/सा0-574/सात-न्याय-1-15-06/2015, दिनांक 01.05.2015
• संख्या सा0-1422/सात-न्याय-1-15-75/2010, दिनांक 21.12.2015
• संख्या 1325/सात-न्याय-1-16-75/2010, दिनांक 27.09.2016
• संख्या 04/2022/130/सात-न्याय-अनु0प्रको0/2022, दिनांक 22.04.2022
• इस विषय से जुड़े अन्य शासनादेश
मुख्य निर्देश: आसान भाषा में
1. हर विभाग में नोडल अधिकारी (Nodal Officer)
हर विभाग को अपने स्तर से एक नोडल अधिकारी नामित करना अनिवार्य है, जो विशेष सचिव से निम्न स्तर का न हो। इस पद पर बार-बार बदलाव नहीं किया जाएगा। नोडल अधिकारी राज्य विधि अधिकारी से समन्वय करके प्रतिशपथ पत्र तैयार करवाएंगे, मुकदमों की लगातार निगरानी करेंगे और देखेंगे कि राज्य मुकदमा नीति का पालन हो रहा है।
विभाग को नोडल अधिकारी का फोन नंबर और ई-मेल 5 कार्य दिवस में अपनी वेबसाइट पर अपडेट करना है, ताकि मुख्य स्थायी अधिवक्ता / शासकीय अधिवक्ता (इलाहाबाद और लखनऊ खंडपीठ) सीधे संपर्क कर सकें।
2. नोटिस विभाग तक जल्दी और पूरी जानकारी के साथ
शासनादेश मानता है कि देरी का बड़ा कारण यह था कि विधि अधिकारी की ओर से भेजे गए नोटिस अधूरे रहते थे। अब राज्य विधि अधिकारी को नोटिस / रिट याचिका की प्रति ई-मेल और स्पीड पोस्ट से 3 कार्य दिवस के भीतर विभाग को भेजनी है। उसमें ये बातें अनिवार्य होंगी: वाद की विषयवस्तु, संबंधित जनपद, औपचारिक व आवश्यक पक्षकार, याची द्वारा मांगा गया अनुतोष (Relief), और कोर्ट के आदेश का प्रभावी अंश।
3. प्रतिशपथ पत्र अधिकतम 10 कार्य दिवस में
• विभाग के अपर मुख्य सचिव / प्रमुख सचिव / सचिव और नोडल अधिकारी मिलकर प्रतिशपथ पत्र अधिकतम 10 कार्य दिवस में दाखिल कराएंगे।
• विभाग प्रस्तरवार आख्या (Para-wise Comments / Narrative) ई-मेल से मुख्य स्थायी अधिवक्ता कार्यालय को भेजेगा। आख्या पूरी और स्पष्ट होनी चाहिए।
• राज्य विधि अधिकारी नैरेटिव मिलने के 10 दिवस के भीतर प्रतिशपथ पत्र तैयार कराएंगे। देर होने पर यह बात मुख्य स्थायी अधिवक्ता / शासकीय अधिवक्ता के संज्ञान में लाई जाएगी।
• विभाग के वरिष्ठ अधिकारी स्वयं नैरेटिव पढ़कर संतुष्ट होने पर ही अनुमोदन देंगे।
• प्रयास रहेगा कि जिस विधि अधिकारी ने प्रतिशपथ पत्र तैयार किया, वही कोर्ट में बहस भी करे।
4. अंतरिम आदेश: 10 कार्य दिवस में पालन या चुनौती
अगर हाईकोर्ट का अंतरिम / स्थगन आदेश (Interlocutory Order) शासन की नीतियों और नियमों के अनुसार है, तो उसका पालन 10 कार्य दिवस में करना है। अगर आदेश नियमों के प्रतिकूल है, तो 10 कार्य दिवस में रिट याचिका, रिकाल / पुनर्विचार प्रार्थना पत्र, विशेष अपील या SLP दाखिल करके कार्रवाई करनी है, ताकि अवमानना की स्थिति न बने।
कर्मचारियों के लिए अहम बात: आदेश में साफ लिखा है कि सेवा संबंधी छोटे (तुच्छ) मामलों में प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी के प्रति अनुकम्पापूर्ण दृष्टिकोण अपनाएं।
5. अवमानना वाद (Contempt) में व्यक्तिगत जिम्मेदारी
अवमानना याचिका में अक्सर अधिकारियों को नाम से पक्षकार बनाया जाता है। ऐसे अधिकारी को अवमाननावाद की सूचना के 10 कार्य दिवस के भीतर व्यक्तिगत रूप से प्रतिशपथ पत्र दाखिल करना होगा, जिसमें बताना होगा कि आदेश का पालन हुआ या नहीं, और नहीं हुआ तो क्यों।
साथ ही कोर्ट के आदेश के पालन में प्राप्त प्रत्यावेदनों (Representations) का निस्तारण स्पीकिंग ऑर्डर के साथ यथाशीघ्र करना है।
6. प्रतिकूल आदेश पर तुरंत राय और जवाबदेही
अगर हाईकोर्ट राज्य के विरुद्ध आदेश देता है, तो विधि अधिकारी उसकी प्रति के साथ आगे की कार्रवाई पर अपनी राय भी तुरंत देंगे। अगर ढीली पैरवी के कारण प्रतिकूल आदेश हुआ, तो जिम्मेदार कर्मी का नाम भी बताया जाएगा। अपील में देरी होने पर दिन-प्रतिदिन का कारण और जिम्मेदार व्यक्ति पर की गई कार्रवाई लिखकर पत्रावली न्याय विभाग को भेजनी होगी।
7. अन्य महत्वपूर्ण निर्देश
• परामर्श की पत्रावलियां ई-ऑफिस से भेजी जाएंगी; परामर्शी विभाग यथासंभव 3 दिवस में राय देगा।
• संयुक्त बैठक में सहमति बनने के बाद बाद में नई आपत्तियां न उठाई जाएं।
• समान प्रकृति के मुकदमों को समेकित (Consolidate) करके एक साथ सुनवाई का अनुरोध किया जाएगा।
• असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर अनावश्यक स्थगन (Adjournment) न लिया जाए।
• न्याय विभाग सभी राज्य विधि अधिकारियों की डायरेक्टरी अपनी वेबसाइट पर डालेगा।
• विभाग मुकदमों का रजिस्टर रखेंगे और पर्सनल मॉनिटरिंग सिस्टम बनाएंगे।
• शासन सरकारी मुकदमों की पैरवी के लिए एक पोर्टल विकसित कर रहा है, जिसका प्रयोग विभाग करेंगे।
समस्या और समाधान: GO के अनुसार क्या बदला
शासनादेश में बताई गई समस्या | अब का निर्देश |
नोटिस में विषयवस्तु, जनपद, पक्षकार जैसी जानकारी अधूरी | 3 कार्य दिवस में पूरी जानकारी के साथ नोटिस विभाग को |
विभाग की प्रस्तरवार आख्या आधी-अधूरी | आख्या पूरी तरह स्पष्ट होने के बाद ही भेजी जाए |
सुनवाई से एक दिन पहले प्रतिशपथ पत्र बनवाना | अधिकतम 10 कार्य दिवस में दाखिल करना अनिवार्य |
नोडल अधिकारी का बार-बार बदलना | विशेष सचिव स्तर से नीचे नहीं, पद पर निरंतरता |
अलग-अलग अधिकारी अधिवक्ता से संपर्क करते, ब्रीफ नहीं होता | केवल नामित अधिकारी अभिलेखों के साथ संपर्क करेंगे |
अवमानना की स्थिति बनना | अंतरिम आदेश पर 10 कार्य दिवस में पालन या चुनौती |

चित्र: शासनादेश दिनांक 08.07.2022 के अनुसार हाईकोर्ट के सरकारी मुकदमों से जुड़ी मुख्य समय-सीमाएं।
स्रोत: शासनादेश संख्या 06/2022/423/सात-न्याय-अनु0प्रको0/2022-1/2008, shasanadesh.up.gov.in
Alt text: UP शासनादेश 2022 के अनुसार हाईकोर्ट के सरकारी मुकदमों में 24 घंटे, 3, 5 और 10 कार्य दिवस की समय-सीमाओं का कार्ड।
उदाहरण: एक कर्मचारी के केस में यह आदेश कैसे काम करता है
मान लीजिए किसी विभाग के एक कर्मचारी ने अपनी वेतन वृद्धि रोके जाने के विरुद्ध हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की (यह एक काल्पनिक उदाहरण है)।
1. याचिका दाखिल होने के 3 कार्य दिवस में राज्य विधि अधिकारी याचिका की प्रति ई-मेल और स्पीड पोस्ट से विभाग को भेजेंगे, साथ में यह कि याची ने क्या राहत मांगी है।
2. विभाग का नोडल अधिकारी पूरी और स्पष्ट प्रस्तरवार आख्या ई-मेल से मुख्य स्थायी अधिवक्ता कार्यालय को भेजेगा।
3. विधि अधिकारी नैरेटिव मिलने के 10 दिवस में प्रतिशपथ पत्र तैयार कराएंगे।
4. विभाग के वरिष्ठ अधिकारी पढ़कर अनुमोदन देंगे और प्रतिशपथ पत्र दाखिल होगा (कुल अधिकतम 10 कार्य दिवस का लक्ष्य)।
5. अगर कोर्ट कर्मचारी के पक्ष में अंतरिम आदेश देता है और वह नियमों के अनुसार है, तो विभाग को 10 कार्य दिवस में उसका पालन करना होगा।
ध्यान दें: अगर कोर्ट ने अपने आदेश में कोई जल्दी की समय-सीमा दी है, तो वही लागू होगी।
विभागीय अधिकारियों से होने वाली आम गलतियां
• नोडल अधिकारी का विवरण वेबसाइट पर अपडेट न करना।
• अधूरी या अस्पष्ट प्रस्तरवार आख्या भेजना।
• सुनवाई की तारीख नज़दीक आने पर ही प्रतिशपथ पत्र बनवाना।
• अंतरिम आदेश को न मानना और न ही समय पर चुनौती देना।
• प्रत्यावेदन का निस्तारण बिना स्पीकिंग ऑर्डर के करना।
• न्याय विभाग के निर्धारित प्रारूप पर विधि अधिकारियों का फीडबैक न देना। (संलग्न प्रारूप में शासकीय अधिवक्ता की पैरवी का पाक्षिक मूल्यांकन होता है: अति उत्तम / उत्तम / संतोषजनक / संतोषजनक भी नहीं।)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: यह शासनादेश किन पर लागू है?
उत्तर: यह उत्तर प्रदेश शासन के सभी विभागों पर लागू है। इसमें विभागीय अधिकारियों, नोडल अधिकारियों और राज्य विधि अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय की गई हैं।
प्रश्न 2: नोडल अधिकारी किस स्तर का होगा?
उत्तर: नोडल अधिकारी विशेष सचिव से निम्न स्तर का नहीं होगा और इस पद पर बार-बार बदलाव नहीं किया जाएगा।
प्रश्न 3: सरकार को प्रतिशपथ पत्र कितने समय में दाखिल करना है?
उत्तर: शासनादेश के अनुसार अधिकतम 10 कार्य दिवस में, जब तक कोर्ट ने कोई अलग समय-सीमा न दी हो।
प्रश्न 4: क्या इससे कर्मचारी के केस का फैसला जल्दी होगा?
उत्तर: यह आदेश सरकार की ओर से समय पर जवाब देने की व्यवस्था तय करता है, जिससे अनावश्यक देरी कम होनी चाहिए। लेकिन फैसला कब होगा, यह कोर्ट पर निर्भर है; इसकी कोई गारंटी यह आदेश नहीं देता।
प्रश्न 5: अवमानना याचिका में अधिकारी को क्या करना होगा?
उत्तर: नामित अधिकारी को सूचना के 10 कार्य दिवस में व्यक्तिगत रूप से प्रतिशपथ पत्र दाखिल करना होगा, जिसमें आदेश के पालन की स्थिति या पालन न होने का कारण बताना होगा।
प्रश्न 6: पुराने शासनादेशों का क्या होगा?
उत्तर: 24.03.2011, 01.05.2015, 21.12.2015, 27.09.2016 और 22.04.2022 के संबंधित शासनादेश तथा इस विषय के अन्य शासनादेश अवक्रमित कर दिए गए हैं।
प्रश्न 7: इस शासनादेश की प्रामाणिकता कैसे जांचें?
उत्तर: शासनादेश पर लिखा है कि इसकी प्रामाणिकता shasanadesh.up.gov.in वेबसाइट से सत्यापित की जा सकती है।
स्रोत और अस्वीकरण
शासनादेश संख्या: 06/2022/423/सात-न्याय-अनु0प्रको0/2022-1/2008, दिनांक 08 जुलाई 2022 जारीकर्ता: मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश शासन; अनुश्रवण प्रकोष्ठ (न्याय विभाग) सत्यापन: http://shasanadesh.up.gov.in यह एक स्वतंत्र सूचना पोर्टल है; आधिकारिक पुष्टि के लिए मूल शासनादेश देखें। |